प्रदक्षिणा क्यों है हमारे जीवन का अनमोल संस्कार? जानिए वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

श्रेणी : videos | लेखक : The Hindu Today | दिनांक : 10 February 2026 11:21

प्रदक्षिणा, यानी किसी दिव्य या पवित्र वस्तु के चारों ओर परिक्रमा करना, हमारे धर्म और संस्कृति का एक प्राचीन और गूढ़ प्रतीक है. हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है – मातृदेवो भव:, पितृदेवो भव:, आचार्यदेवो भव: – अर्थात हमारे माता, पिता और शिक्षक भी हमारे लिए भगवान समान होते हैं. इसी दृष्टिकोण से हम उनकी और उन व्यक्तित्वों की भी प्रदक्षिणा करते हैं जिन्हें हम दिव्य मानते हैं.

वैदिक और पौराणिक शास्त्रों में प्रदक्षिणा का अर्थ केवल परिक्रमा करना नहीं है. यह अपने सर्वस्व को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने और उनकी ऊर्जा का साक्षात अनुभव करने का माध्यम है. जैसे सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा उसके जीवनदायिनी प्रभाव को बनाए रखती है, उसी तरह भगवान के चारों ओर प्रदक्षिणा करना हमारे जीवन में आध्यात्मिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा को स्थिर करता है.

प्रदक्षिणा करते समय व्यक्ति का दाहिना अंग भगवान की ओर होता है, जिससे मूर्ति के आसपास उत्पन्न दिव्य ऊर्जा का लाभ सीधे प्राप्त होता है. यह केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना और आत्मज्ञान को भी जागृत करती है. पूजा के बाद अपनी खुद की परिक्रमा करना यह दर्शाता है कि जिस ईश्वर की हम पूजा करते हैं, वही हमारे अंदर भी विराजमान है.

शास्त्रों के अनुसार, प्रदक्षिणा न केवल पिछले जन्मों के पापों के शमन का साधन है, बल्कि यह अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्यकारी और शनिदेव को प्रसन्न करने वाली क्रिया भी है. यह एक प्रकार का तप है, जो हमें ईश्वर के प्रति समर्पण और भक्ति की अनुभूति कराता है.

इस प्रकार, प्रदक्षिणा हमारे जीवन में आध्यात्मिक चेतना, मानसिक शांति और ईश्वरीय कृपा का स्रोत बनती है. यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, संतुलन और दिव्यता का अनुभव कराने वाला एक प्राचीन विज्ञान है.