राशियों से समझें कब कौन सा मेला कहां लगता है? आइए जानते हैं महाकुंभ का इतिहास

श्रेणी : videos | लेखक : The Hindu Today | दिनांक : 20 February 2026 11:58

महाकुंभ केवल आस्था का महासंगम नहीं, बल्कि इतिहास और परंपरा की लंबी यात्रा का जीवंत प्रतीक है. कुंभ मेले की परंपरा को कम से कम 1400 वर्ष पुराना माना जाता है. कुछ ऐतिहासिक संदर्भ यह भी संकेत देते हैं कि इसकी जड़ें 525 ईसा पूर्व तक जाती हैं, हालांकि इन दावों पर विद्वानों के बीच मतभेद भी हैं.

कुंभ मेले के आयोजन और उसकी संरचना को लेकर विभिन्न विद्वानों की अलग-अलग धारणाएं रही हैं. वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ या अर्धकुंभ स्नान का स्वरूप आज जैसा संगठित और प्रशासनिक दृष्टि से सुव्यवस्थित नहीं था. उस समय यह अधिकतर धार्मिक अनुष्ठानों और साधु-संतों के जुटान के रूप में आयोजित होता था.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गुप्त काल में कुंभ आयोजन अधिक व्यवस्थित रूप लेने लगा. हालांकि, स्पष्ट और प्रमाणिक उल्लेख सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन (617–647 ई.) के समय से प्राप्त होते हैं. उनके शासनकाल में प्रयाग क्षेत्र में बड़े धार्मिक समागमों का वर्णन मिलता है, जो कुंभ परंपरा के ऐतिहासिक साक्ष्य माने जाते हैं.

बाद के काल में जगतगुरु आदि शंकराचार्य और उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों की स्थापना और उनके स्नान क्रम को संगठित स्वरूप प्रदान किया. संगम तट पर अखाड़ों के शाही स्नान की परंपरा इसी व्यवस्थात्मक प्रयास का परिणाम मानी जाती है.

इस प्रकार महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से विकसित होती आ रही सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक परंपरा का विराट उत्सव है, जिसमें इतिहास और आस्था दोनों का अद्भुत संगम दिखाई देता है.