भूल कर न करें इस गलती को नहीं राजा से बन जाएंगे रंग!

श्रेणी : videos | लेखक : The Hindu Today | दिनांक : 20 February 2026 11:47

आज के आधुनिक दौर में हर व्यक्ति अपने करियर के साथ-साथ एक सुंदर और सुरक्षित घर का सपना भी संजोकर रखता है. यही वजह है कि अब अधिकांश लोग घर निर्माण के समय वास्तु शास्त्र का विशेष ध्यान रखते हैं. हालांकि, वास्तु की मूल भावना और उसके वैज्ञानिक आधार को हर कोई गहराई से नहीं समझ पाता.

‘द हिन्दू टूडे, लंदन’ अपनी विशेष प्रस्तुति में आपको वास्तु शास्त्र की मूल अवधारणा से सरल और संक्षिप्त रूप में परिचित करा रहा है. इस श्रृंखला में तथ्यात्मक जानकारी के साथ कानपुर के वास्तु विशेषज्ञ विमल झाझरिया से भी आपकी मुलाकात कराई जाएगी, जिनके सुझाव घर निर्माण में उपयोगी साबित हो सकते हैं. आइए, वास्तु के इस डिजिटल संवाद में आप भी हमारे सहभागी बनें.

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि वास्तु शास्त्र भारतीय ऋषि-मुनियों की अमूल्य देन है. ऋग्वेद में घर के संरक्षक को ‘वास्तुपति’ कहा गया है. भगवान विश्वकर्मा को इस शास्त्र का जनक माना जाता है. भारतीय दर्शन, गणित, भूगोल, भूविज्ञान और आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित यह विद्या सदियों से जीवन को संतुलित और सकारात्मक बनाने का मार्ग दिखाती रही है.

वास्तु के प्रमुख सुझाव

घर का मुख्य द्वार पूर्व या उत्तर दिशा में हो तो शुभ माना जाता है.

घर का ढलान पूर्व, उत्तर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की ओर होना अच्छा रहता है. बोरिंग भी इन्हीं दिशाओं में करना उपयुक्त माना जाता है.

पूर्वमुखी घर सर्वोत्तम माने जाते हैं, जबकि उत्तर-पश्चिम दिशा भी एक विकल्प हो सकती है.

घर के आगे या पीछे छोटा ही सही, पर खुला आंगन सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है.

रसोईघर आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में होना चाहिए.

अतिथि कक्ष उत्तर-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में उपयुक्त माना जाता है.

घर में दरवाजों और खिड़कियों की कुल संख्या सम (Even) होनी चाहिए.

दक्षिण दिशा में साथ दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर लगाना शुभ और प्रगति का प्रतीक माना जाता है.

वास्तु शास्त्र केवल दिशाओं का विज्ञान नहीं, बल्कि संतुलित और सकारात्मक जीवन की एक परंपरागत प्रणाली है. सही समझ और विवेक के साथ इसका उपयोग घर को सुख-मृद्धि का केंद्र बना सकता है.