स्वामी वेदतत्त्वानन्द पुरी का जीवन आधुनिक तकनीकी शिक्षा और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के दुर्लभ संगम का सशक्त उदाहरण है. एक पेशेवर इंजीनियर से अद्वैत वेदांत और संस्कृत व्याकरण के विद्वान संन्यासी बनने तक की उनकी यात्रा समकालीन भारत में आध्यात्मिक और शैक्षणिक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण अध्याय रचती है. यह प्रोफाइल उनके जीवन के विभिन्न चरणों, संस्थागत नेतृत्व, शिक्षा-नीति में योगदान और भारतीय ज्ञान परंपरा (IKT) के पुनर्संस्थापन में उनकी भूमिका का समग्र, सुस्पष्ट और तथ्यपरक परिचय प्रस्तुत करती है.
प्रारंभिक जीवन और शैक्षणिक पृष्ठभूमि
स्वामी वेदतत्त्वानन्द पुरी की बौद्धिक यात्रा तर्कसंगत विज्ञान और पारंपरिक शास्त्रीय विद्या-दोनों के समन्वय से आकार लेती है. उन्होंने 1997 में भारत के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे (COEP) से बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (BE) की उपाधि प्राप्त की. COEP की कठोर अकादमिक परंपरा ने उनके व्यक्तित्व में विश्लेषणात्मक दृष्टि, अनुशासन और व्यवस्थित कार्यशैली का विकास किया. यह वह दौर था जब भारत में सूचना प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग का विस्तार हो रहा था, किंतु तकनीकी पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने जीवन को मानवता की आध्यात्मिक सेवा और प्राचीन विद्या के संरक्षण हेतु समर्पित करने का साहसिक निर्णय लिया.
संन्यास और रामकृष्ण परंपरा
1998 में मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने सांसारिक संभावनाओं का त्याग कर रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन में प्रवेश किया और संन्यास दीक्षा ग्रहण की. उन्होंने ‘आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च’—अपनी मुक्ति और जगत के कल्याण के आदर्श को जीवन का ध्येय बनाया. रामकृष्ण परंपरा के इस वातावरण में सेवा और साधना का संतुलन उनकी कार्यशैली का आधार बना.
संस्कृत अध्ययन और व्याकरण
संन्यास जीवन के दौरान उनकी अध्ययन-लालसा संस्कृत के गहन अध्ययन की ओर अग्रसर हुई. 2014 में उन्होंने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (वर्तमान: केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय) से व्याकरण आचार्य (एम.ए.) की उपाधि प्राप्त की. पाणिनीय व्याकरण की सूक्ष्म समझ ने उन्हें प्राचीन ग्रंथों के संपादन, व्याख्या और आधुनिक संदर्भों में अनुप्रयोग हेतु सक्षम बनाया. क्योंकि भारतीय दर्शन में व्याकरण को ‘मुख’ कहा गया है.
रामकृष्ण मिशन में नेतृत्व और संस्थागत निर्माण
लगभग 22 वर्षों तक रामकृष्ण मठ एवं मिशन में सेवा करते हुए स्वामी जी ने संस्कृत और वैदिक शिक्षा के संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया. विवेकानंद वेद विद्यालय, बेलुड़ मठ में उन्होंने छह वर्षों तक प्राचार्य के रूप में कार्य किया. यह आवासीय गुरुकुल समाज के वंचित वर्गों को निःशुल्क शिक्षा और आवास प्रदान करता है. उनके नेतृत्व में विद्यालय में परंपरा और आधुनिकता का संतुलन स्थापित हुआ—वेदों का सस्वर पाठ, संस्कृत व्याकरण के साथ-साथ मूलभूत कंप्यूटर शिक्षा और शारीरिक विकास पर भी बल दिया गया.
इसके अतिरिक्त, रामकृष्ण मिशन विवेकानंद शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान (RKMVERI) में संस्कृत विभाग के समन्वयक के रूप में उन्होंने उच्च शिक्षा के ढांचे में संस्कृत को शोधपरक विषय के रूप में सुदृढ़ किया. पाठ्यक्रम निर्माण, शिक्षक समन्वय और शोध मार्गदर्शन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही.
NIOS और भारतीय ज्ञान परंपरा (IKT)
स्वामी वेदतत्त्वानन्द पुरी का सर्वाधिक प्रभावी योगदान राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के साथ मिलकर भारतीय ज्ञान परंपरा (IKT) को स्कूली शिक्षा में एकीकृत करना है. उन्होंने माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर वेद अध्ययन, संस्कृत व्याकरण, भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य, योग, प्राचीन भारतीय विज्ञान और व्यावसायिक कौशल जैसे विषयों के पाठ्यक्रम निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाई.
उन्होंने न केवल पाठ्यक्रम बनाए, बल्कि पुस्तकों के संपादन और लेखन में भी योगदान दिया. संस्कृत और हिंदी माध्यम में तैयार ये सामग्री दूर-दराज के छात्रों तक पहुँची. 2021 में इन पाठ्यसामग्रियों का विमोचन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की भावना के अनुरूप हुआ. पंचमहाभूतों को आधुनिक पर्यावरणीय दृष्टि से जोड़ना और व्यावसायिक कौशल को जीवनोपयोगी बनाना उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उदाहरण है.
नीति-निर्माण और शैक्षिक निकायों में भूमिका
उनकी विशेषज्ञता को मान्यता देते हुए उन्हें NIOS की अकादमिक परिषद और NCERT की Educational Research and Innovation Committee (ERIC) का सदस्य बनाया गया. यहाँ उन्होंने मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से भारतीय ज्ञान विषयों को सुलभ, अकादमिक और नवाचारी बनाने में योगदान दिया.
वर्तमान दायित्व: शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास
वर्तमान में स्वामी जी मध्य प्रदेश सरकार के अंतर्गत शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, भोपाल में आवासीय आचार्य हैं. ओंकारेश्वर में विकसित हो रहा एकात्म धाम. जिसमें 108 फीट ऊँची ‘स्टैच्यू ऑफ ऑननेस’, ‘अद्वैत लोक’ और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान शामिल हैं में वे बौद्धिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं.
स्वतंत्र संस्थागत पहल
उन्होंने विवेकानंद रामकृष्ण मठ फाउंडेशन की स्थापना कर पांडुलिपि संरक्षण, पुस्तकालय निर्माण, शिक्षा–स्वास्थ्य सेवाओं और आदिवासी क्षेत्रों में सामुदायिक कार्यों को संगठित रूप दिया. मांडला (मध्य प्रदेश) स्थित केंद्र के माध्यम से वे रामकृष्ण–विवेकानंद विचारधारा का ग्रामीण विस्तार कर रहे हैं. उनकी विद्वत्ता संस्कृत व्याकरण, न्याय और अद्वैत वेदांत में विशेष रूप से परिलक्षित होती है. न्याय के तर्क और वेदांत के निष्कर्षों का संयोजन उनके प्रवचनों की विशिष्टता है. वे प्रैक्टिकल वेदांत के समर्थक हैं. जहाँ शिक्षा चरित्र-निर्माण और आत्मनिर्भरता का साधन बनती है.