श्रेणी : अन्य | लेखक : admin | दिनांक : 30 September 2022 04:19
भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी कालिंदी की कल-कल करती धारा समय के साथ धीमी जरूर पड़ गई है, लेकिन आज भी कालिंदी के कूल पर भक्ति, आस्था और विश्वास में किसी भी तरह की कमी देखने को नहीं मिलती है। अपने आराध्य के दर्शन को देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु भी यहीं कहते हैं, भोर हो तो यमुना के विश्राम घाट जैसी हो क्योंकि यहां पर शंख, घड़ियाल के साथ यमुना महारानी की आरती के स्वरों का मिलाप होता है। जिसके लिए सात समुद्र दूर से भक्त घाट पर पहुंचकर न केवल विश्राम करते हैं, बल्कि भक्ति की कल-कल करती उफानों के साथ यमुना में डुबकी लगाकर पुण्य कमाते हैं। आरती से पहले ही भक्त यमुना में स्नान, आचमन करते हैं। जिनकी अपने आराध्य के प्रति प्रेम को देखकर ब्रजवासी भी मोहित हो उठते हैं।
विश्राम घाट, कान्हा की नगरी में उमड़ने वाली श्रद्धा का प्रमुख केंद्र हैं। वर्तमान समय में यमुना का जल बेशक कम हो गया हो, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था अनवरत चल रही है। यहां भगवान श्रीकृष्ण के समय की परंपराएं आज भी कायम हैं। आज भी मरने वाले को इसी घाट पर कुछ पल के लिए विश्राम कराया जाता है। इसके पीछे का तर्क हैं कि विश्राम घाट पर ही सभी देवी देवताओं का वास है। वह इसी घाट पर स्नान भी करते हैं। यहां पर स्नान करने से स्वर्ग गंगा का फल भी मिलता है। मथुरा सप्तपुरियों में भी शामिल है। इतना ही नहीं प्राचीन ग्रंथों में विश्राम घाट को विश्रांति तीर्थ कहा गया है। वराह पुराण के अनुसार भगवान वराह वसुंधरे से कहते हैं कि है देवी, मथुरा का विश्रांति तीर्थ तीनों लोक में प्रसिद्ध है। यहां स्नान करने वाला मानव मेरे लोक में रहने का स्थान पाता है। इस तीर्थ पर स्वयं श्री हरि विश्राम करते हैं।
वराह पुराण में कहा गया है कि मथुरा के विश्राम तीर्थ, दीर्घ विष्णु व केशव देव के दर्शन से पुण्य फल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर इसी विश्राम घाट पर विश्राम किया था। इसलिए इस घाट का नाम विश्राम घाट पड़ गया।
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