श्रेणी : अन्य | लेखक : डॉ. राधेश्याम शुक्ल | दिनांक : 12 February 2026 01:45
धर्म और ऋत् भारतीय दर्शन के दो मूल स्तंभ हैं. ऋत् सार्वभौम प्राकृतिक नियमों का प्रतीक है, जो सूर्य, चंद्र, वायु, जल और पृथ्वी जैसी प्राकृतिक शक्तियों से संचालित होता है. यह नियम केवल प्रकृति में ही नहीं, बल्कि मानव जीवन और समाज के लिए भी मार्गदर्शक है.
धर्म मानव चेतना और बुद्धि के मार्गदर्शन के लिए आवश्यक है. बुद्धि के स्वतंत्र प्रयोग से उत्पन्न छल, कपट, धोखा जैसे दुर्गुणों को नियंत्रित करने के लिए ऋषियों ने धर्म की स्थापना की. धर्म न केवल न्याय और सदाचार का पालन सिखाता है, बल्कि समाज और प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखता है. इस तरह, धर्म और ऋत् एक दूसरे के पूरक हैं, जहाँ ऋत् स्थिर सार्वभौम नियम है और धर्म मानव-निर्मित सामाजिक नियमों का समूह.
1. ऋत् क्या है और इसका सार्वभौम नियमों से क्या संबंध है?
ऋत् सार्वभौम प्राकृतिक नियमों का प्रतीक है, जिसे प्राचीन काल के वेदों और शास्त्रों में ब्रह्मांड की व्यवस्था के लिए प्रयोग किया गया. ऋतु या ऋत् का अर्थ है वह नियम या कानून जिससे पूरे विश्व का संचालन होता है. यहाँ तक कि देवतागण भी इस नियम के अधीन माने गए. ऋत् के संदर्भ में प्राकृतिक शक्तियों, जैसे सूर्य, चंद्र, वायु, जल, प्रकाश, पृथ्वी, समुद्र, वृक्ष, ग्रह और नक्षत्र आदि, को देवता कहा गया. प्रारंभिक विद्वानों ने इन शक्तियों के पीछे एक सूक्ष्म चेतन तत्व की कल्पना की, जिसे मूर्तिमान देवता के रूप में पूजा गया. अतः ऋत् केवल प्राकृतिक शक्ति नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति के लिए स्थिरता और संतुलन बनाए रखने वाला नियम है.
2. मानव के लिए धर्म की आवश्यकता क्यों है?
मनुष्य भी प्रकृति का हिस्सा है और प्राकृतिक नियमों यानी ऋत् के अधीन रहता है. परंतु मानव चेतना और बुद्धि का विकास उसे केवल प्राकृतिक नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं रखता. बुद्धि के स्वतंत्र प्रयोग से छल, कपट, धोखा, झूठ जैसे दुर्गुण उत्पन्न होते हैं और सत्य, परोपकार, सेवा, करुणा, त्याग जैसे सद्गुण भी विकसित होते हैं. इसलिए ऋषियों ने मानव व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए कुछ नियम बनाए, जिन्हें धर्म कहा गया. यदि ऋत् प्रकृति और ईश्वर की शाश्वत व्यवस्था है, तो धर्म मानव-निर्मित सामाजिक व्यवस्था है, जो सदाचार और न्यायपूर्ण आचरण सुनिश्चित करती है.
3. धर्म का विकास क्रम किस प्रकार हुआ?
मनुस्मृति में वर्णित है कि कृतयुग में धर्म अपनी पूर्णता के साथ विद्यमान था, पर समय के साथ मानव जनसंख्या और समाजिक जटिलताओं के कारण पुराने नियमों और आदर्शों में परिवर्तन आया. यह विकासशील दृष्टिकोण दर्शाता है कि धर्म स्थिर नहीं, बल्कि मानव आचरण और सामाजिक परिस्थिति के अनुसार लचीला और गतिशील है. भारत के प्राचीन आचार्यों ने इस बात को समझा और धर्म के नियमों को लगातार बदलते समाज और परिस्थितियों के अनुकूल बनाया.
4. मानव आचरण को नियंत्रित करने का प्रथम प्रयास कब और कैसे हुआ?
मनुष्य के आदर्श आचरण को नियंत्रित करने का पहला प्रयास परंपराओं, रीति-रिवाजों और आचार्य-निर्देशों के माध्यम से हुआ. प्राचीन काल में सारे ज्ञान का स्रोत प्रजापति या ब्रह्मा माने गए और मानव के प्रथम शासक के रूप में मनु की कल्पना की गई. ‘मनु’ शब्द केवल शासक का प्रतीक है, न कि किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम. मनुस्मृति, महर्षि भृगु के कथन और परंपराओं का संकलन है, जो मानव और समाज के आचार-व्यवहार को नियंत्रित करने का पहला व्यवस्थित प्रयास माना जा सकता है.
5. क्या वेद धर्म के मूल हैं?
वेद धर्म के मूल स्रोत जरूर माने गए हैं, लेकिन यह पूरी तरह सत्य नहीं है. वेदों में आचरण और व्यवहार के कुछ नियम निश्चित रूप से पाए जाते हैं, परंतु संपूर्ण धर्म केवल वेदों से ही नहीं निर्धारित होता. प्राचीन आचार्यों ने वेदज्ञों के आचरण और परंपराओं को भी धर्म का मूल माना. आपस्तंभ धर्मसूत्र और वशिष्ठ जैसे आचार्यों के अनुसार, धर्म को जानने का प्रमाण वेद, स्मृतियाँ और शिष्टों के आचरण हैं. इन तीनों का संयोजन ही धर्म का वास्तविक आधार है, किसी एक को सर्वोच्च नहीं माना गया.
6. शील और शिष्टाचार क्या हैं?
शील का अर्थ है व्यवहार की कोमलता, दूसरों को दुःख न पहुँचाने की भावना और समाज के प्रति संवेदनशीलता. आचार या शिष्टाचार का अर्थ है सदाचार, विनम्रता और समाज के लिए निःस्वार्थ कार्य. वेदज्ञ और धर्मज्ञ व्यक्ति के शिष्टाचार को भी धर्म का प्रमाण माना जाता है, परंतु निजी लाभ और आनंद के लिए किए गए कर्म धर्म के लिए प्रमाण नहीं माने जाते.
7. शिष्ट कौन है?
शिष्ट वह व्यक्ति है जो राग-द्वेष से रहित, समाज और लोक कल्याण के लिए आचरण करता है. उसका लक्ष्य निजी लाभ या सुख नहीं, बल्कि लोक हितकारी कार्य करना है. शिष्ट का हृदय सांसारिक इच्छाओं से रहित होता है, और उसके कर्म निहित स्वार्थ से मुक्त होते हैं. महाभारत में कहा गया है – “महाजनो येन गताः स पंथाः” – इसका अर्थ है कि शिष्टों का मार्ग समाज के लिए आदर्श आचरण है.
8. धर्म और ऋत् का संबंध क्या है?
ऋत् प्रकृति और ब्रह्मांड की सार्वभौम व्यवस्था है, जबकि धर्म मानव के लिए बनाए गए सामाजिक और आचारिक नियम हैं. जहाँ ऋत् स्थिर और सार्वभौम है, वहीं धर्म लचीला और मानव व्यवहार के अनुसार गतिशील है. धर्म का उद्देश्य सदाचार, न्याय और लोक कल्याण सुनिश्चित करना है. इस तरह धर्म मानव और समाज के विकास के लिए आवश्यक नियमों का समूह है, जो प्राकृतिक नियमों यानी ऋत् के अनुरूप या उसके पूरक रूप में कार्य करता है.
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