श्रेणी : अन्य | लेखक : डॉ. राधेश्याम शुक्ल | दिनांक : 12 February 2026 11:05
धर्म भारतीय दर्शन का मूल स्तंभ है, जिसे केवल किसी विशेष सम्प्रदाय या मत तक सीमित नहीं किया जा सकता. धर्म जीवन का वह निर्धारित ढंग है, जो मानव के कर्मों, आचरण और सामाजिक व्यवहार को व्यवस्थित करता है. यह मनुष्य को मानवीय अस्मिता, न्याय और सदाचार की ओर अग्रसर करता है. धर्म का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था या पूजा नहीं, बल्कि समाज में नैतिकता, न्याय और संतुलन बनाए रखना है.
प्राचीन काल में धर्म को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया गया- श्रौत और स्मृति. श्रौत धर्म वैदिक कर्मों और यज्ञों पर आधारित था, जबकि स्मार्त धर्म स्मृतियों और सामाजिक कर्तव्यों से जुड़ा. इसके अलावा, धर्म के तीन स्त्रोत – श्रौत, स्मार्त और शिष्टाचार – समाज और मानव आचरण में आदर्श और निःस्वार्थ व्यवहार सुनिश्चित करते हैं.
सनातन धर्म, जो सार्वकालिक नियम और आदर्शों पर आधारित है, जैसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय और ब्रह्मचर्य, समाज में नैतिकता और न्याय बनाए रखने के लिए मार्गदर्शक हैं. वास्तविक धर्म का पालन विधि और न्याय के माध्यम से होता है, न कि केवल मठ या मंदिर से. भारत में न्याय-प्रधान परंपरा और धर्मयुद्ध इसकी प्रमाणिकता को दर्शाते हैं.
अध्याय 3: धर्म क्या है – सम्प्रदाय नहीं, समाज व्यवस्था
1. धर्म और सम्प्रदाय में क्या भिन्नता है?
धर्म किसी विशेष सम्प्रदाय या मत का द्योतक नहीं है. धर्म जीवन का वह निर्धारित ढंग या आचरण संहिता है, जो समाज और व्यक्तियों के कर्मों को व्यवस्थित करता है. यह मनुष्य के चरित्र का विकास करता है और उसे मानवीय अस्मिता के उच्चतम लक्ष्य तक पहुँचने योग्य बनाता है. सम्प्रदाय केवल धार्मिक मान्यता या आस्था से जुड़ा होता है, जबकि धर्म समाज में नैतिकता, न्याय और सदाचार बनाए रखने का साधन है.
2. धर्म के कौन-कौन से विभाग हैं?
धर्म को प्राचीन काल में दो प्रमुख भागों में बांटा गया था: श्रौत और स्मृति.
श्रौत धर्म: वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों पर आधारित है. इसमें मुख्य रूप से वैदिक कर्म और संस्कार आते हैं, जैसे यज्ञ, सोम कृत्य, पूर्णमासी-अमावस्या यज्ञ आदि.
स्मार्त धर्म: स्मृतियों पर आधारित है और इसमें वर्णाश्रम धर्म, कर्तव्य, नैतिक नियम और सामाजिक व्यवहार शामिल हैं.
इस विभाजन से यह सुनिश्चित किया गया कि लौकिक और पारलौकिक कर्म एक-दूसरे में गड़बड़ न हों.
3. धर्म के कितने स्त्रोत माने जाते हैं?
धर्मशास्त्रों में धर्म को त्रिबिध स्रोतों से जोड़ा गया है:
श्रौत (वैदिक) – वेदों और वैदिक कर्मों पर आधारित.
स्मार्त (स्मृतियों पर आधारित) – वर्ण, आश्रम और कर्तव्यों से संबंधित.
शिष्टाचार (शिष्टों का आचरण) – समाज में आदर्श और निःस्वार्थ व्यवहार.
महाभारत में इसे स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तीनों ही धर्म सनातन हैं— वेदोक्त, स्मृति आधारित और शिष्टों द्वारा आचरित.
इसके अलावा, मनु-स्मृति के टीकाकारों ने धर्म को 6 भागों में बाँटा है:
वर्ण धर्म – जातियों के कर्तव्य
आश्रम धर्म – जीवन के चरणों के कर्तव्य
वर्णाश्रम धर्म – जाति और आश्रम के परस्पर कर्तव्य
गुण धर्म – पद और जिम्मेदारी से जुड़े कर्म
नैमित्तिक धर्म – वर्जित कार्य या प्रायश्चित
साधारण धर्म – सार्वकालिक नियम जैसे सत्य बोलना, चोरी न करना, अहिंसा.
4. सनातन धर्म क्या है और इसका महत्व क्या है?
सनातन धर्म वे नियम और आदर्श हैं, जो सार्वकालिक स्वीकृति प्राप्त हैं. इनमें साधारण धर्म शामिल हैं, जैसे अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और निःस्वार्थ आचरण.
संत और महापुरुष जैसे भगवान बुद्ध और महावीर ने वैदिक श्रौत कर्मों को नकार कर इन साधारण धर्मों को अपनाया और उनमें विशेष जोर दिया. सनातन धर्म का उद्देश्य समाज में नैतिकता और न्याय बनाए रखना है.
5. क्या धर्म केवल मठ या मंदिर से संचालित होता है?
धर्म का वास्तविक स्रोत विधि और न्याय हैं. प्राचीन काल में न्यायालयों को धर्मपीठ या धर्मस्थान कहा गया और विधिशास्त्रियों को ही धर्माचार्य माना गया. मठ या मंदिर केवल धार्मिक आस्थाओं का केंद्र होते थे, पर व्यवहारिक न्याय और धर्म का पालन मुख्य रूप से न्यायालयों और शासन प्रणाली द्वारा सुनिश्चित होता था.
6. भारत में धर्म की न्याय-प्रधान परंपरा क्या रही है?
भारत में सदैव कानून और विधि का शासन धर्म की पहचान रहा है. इसे पश्चिमी देशों में आधुनिक काल में स्थापित किया गया, जबकि यहाँ प्राचीन समय से न्याय ही धर्म का प्रतीक था. धर्मयुद्ध का अर्थ भी ऐसा युद्ध है, जो न्याय की रक्षा के लिए लड़ा गया हो. काल के साथ धर्म की यह न्याय-भावना कई बार कमजोर हुई, और विविध संप्रदायों ने धर्म की व्यावहारिक अवधारणाओं को ढक दिया.
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