श्रेणी : अन्य | लेखक : डॉ. राधेश्याम शुक्ल | दिनांक : 13 February 2026 16:56
धर्म और दर्शन के विषय में विचार करते समय अक्सर यह मान लिया जाता है कि धर्म केवल आस्था का विषय है और मतभेद स्वाभाविक रूप से उसकी प्रकृति का हिस्सा हैं. किंतु यदि धर्म को आत्म-संतुष्टि, आनंद और लोक-कल्याण के लिए निर्धारित आचार-नियमों के रूप में समझा जाए, तो उसका स्वरूप कहीं अधिक गंभीर और उत्तरदायी हो जाता है.
भारतीय परंपरा में धर्म का निर्धारण राग-द्वेष से मुक्त, लोकहित के प्रति समर्पित विद्वानों द्वारा ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के आधार पर किया गया माना गया है. इसलिए मूलतः धर्म का उद्देश्य समाज को जोड़ना था, बाँटना नहीं. फिर भी इतिहास में अनेक पंथ, मत और संप्रदाय उत्पन्न हुए, जिनसे भ्रम और विभाजन की स्थितियाँ बनीं. इन मतभेदों की जड़ क्या है, वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक दर्शन में अंतर कैसे किया जाए, और परंपराएँ रूढ़ क्यों हो जाती हैं. इन्हीं प्रश्नों की विवेचना आगे प्रस्तुत है.
धर्म में आम सहमति क्यों महत्वपूर्ण है?
अब तक के विवरण से यह स्पष्ट हो चुका है कि आत्म-संतुष्टि, आनंद और लोक-कल्याण के लिए जो नियम और आचरण निर्धारित किए गए, वही धर्म हैं. ये नियम विद्वानों और महर्षियों द्वारा बनाए गए थे, जो राग-द्वेष से मुक्त, पक्षपात रहित और लोकहित के प्रति समर्पित थे.
ऐसे धर्मशास्त्रकारों और धार्मिक आचार्यों में कभी भी द्वंद्व या संघर्ष नहीं होता था. यदि कोई मतभेद उत्पन्न होता, तो धर्मज्ञ विद्वानों की सभा या बैठक में तर्क के आधार पर उचित-अनुचित का निर्णय लिया जाता. जो निर्णय उचित होता, वह सभी के लिए मान्य होता. चूँकि इनमें किसी का निहित स्वार्थ नहीं था, इसलिए अलग-अलग पंथों का जन्म नहीं हुआ. यही कारण है कि इस देश में सैकड़ों धर्मशास्त्र और अनगिनत धर्मशास्त्री होने के बावजूद आचारधर्म की एक निरंतर धारा चली आई.
छोटे-मोटे मतभेद होते भी थे, तो भी कोई हठ नहीं था. व्यापक मानवहित के विरुद्ध कोई स्थापना स्वीकार नहीं की जाती थी. इसलिए धर्मशास्त्रों की परंपरा में समय-समय पर सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन होते रहे. फिर सवाल उठता है कि ऐसा कौन-सा धर्म है, जिससे नए-नए पंथ और मतभेद उत्पन्न हुए, जिन्होंने समाज को बाँट दिया और आज दुनिया में परेशानी का कारण बने?
मतभेदों की जड़ क्या है?
असल में धर्म में उत्पन्न मतभेदों की जड़ दर्शन या फिलॉसफी में है. ज्ञान और विज्ञान में मतभेद की गुंजाइश कम होती है, क्योंकि प्रयोग और परीक्षण के माध्यम से सत्य की पुष्टि की जा सकती है. दर्शन परिकल्पनाओं पर आधारित होता है, और ये परिकल्पनाएँ दो प्रकार की हो सकती हैं. वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक. ज्ञान और विज्ञान के आधार पर तर्क द्वारा जो परिणाम निकलता है, वह वैज्ञानिक होता है. वहीं निहित स्वार्थ या अज्ञानता के कारण बनाई गई कल्पनाएँ अवैज्ञानिक होती हैं. कुछ लोग थोड़े-बहुत ज्ञान को लेकर अपनी मिथ्या कल्पनाएँ जोड़कर अपना दर्शन बनाते हैं. ये मिथ्या कल्पनाएँ अज्ञानी समुदाय की जिज्ञासा शांत कर देती हैं, इसलिए उनके अनुयायी बढ़ते हैं. ऐसे लोग तर्क को अपने पास आने नहीं देते और श्रद्धा-विश्वास पर जोर देते हैं.
साधारणजन वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक दर्शन में भेद क्यों नहीं कर पाते?
साधारणजन के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन-सा दर्शन वैज्ञानिक है और कौन-सा अवैज्ञानिक. इसलिए वे अपने गुरु या आचार्य के वचन में अंध-श्रद्धा रखने लगते हैं और आंख बंद करके उसका पालन करते हैं. जब कोई पंथ या मत फैलता है, तो उसके अनुयायी उसकी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए नए-नए तर्क और सिद्धांत गढ़ने लगते हैं. ये तर्क प्रायः सत्य से असंबंधित होते हैं. धीरे-धीरे उनके दर्शनों की पोथियाँ मोटी हो जाती हैं, और उनके दार्शनिकों की संख्या बढ़ती है.
फिर ये पंथ या दर्शन यह साबित करने लगते हैं कि उनका पंथ सबसे प्राचीन है, क्योंकि प्राचीनता को प्रामाणिकता का आधार माना जाता है. इसके लिए नकली साहित्य और प्रमाण बनाए जाते हैं. इस तरह दार्शनिक पंथों और संप्रदायों का महाजाल तैयार होता है, जिसे आज भारत और अन्य देशों में देखा जा सकता है.
वैज्ञानिक दर्शनों में भी मतवैभिन्य क्यों होता है?
संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान किसी एक व्यक्ति में समाहित नहीं हो सकता. हर व्यक्ति की तर्क-शक्ति अलग होती है. जिसकी बुद्धि और ज्ञान अधिक है, वह अज्ञात रहस्यों में गहराई तक पैठ सकता है. वैज्ञानिक दर्शनों में मतभेद होते हैं, लेकिन यहाँ स्वार्थ नहीं रहता और ध्यान सत्य की खोज पर केंद्रित होता है. इसलिए मतभेदों के बावजूद द्वंद्व या वैमनस्य नहीं होता. नए बुद्धिमान व्यक्ति पुराने गलत विचारों को मिटाकर तर्कसंगत व्याख्याएँ स्थापित करता है. इस प्रकार वैज्ञानिक दर्शन की धारा निरंतर आगे बढ़ती रहती है. इसमें उदारता, वैज्ञानिकता और तर्कशीलता बनी रहती है; अंधविश्वास और हठवाद नहीं जम पाते.
उपनिषदिक दर्शन क्यों वैज्ञानिक माना जाता है?
भारतीय उपनिषदों में विकसित दर्शन विशुद्ध वैज्ञानिक है. प्रारंभिक उपनिषद अपने समय के नवीनतम ज्ञान और विज्ञान पर आधारित थे. षड्दर्शन (छः प्रमुख दार्शनिक मत) प्रायः विज्ञान और तर्क पर आधारित थे. आगे चलकर शैव, वैष्णव और शाक्त दर्शनों का विकास भी वैज्ञानिक तर्कों पर हुआ. धीरे-धीरे परंपराओं में ऐसे लोग आए, जो विज्ञान से दूर थे या समकालीन विज्ञान से असंबंधित थे. उन्होंने अपनी कल्पना और श्रद्धा से नए रंग भर दिए, जिन्हें केवल आस्थावादी ही स्वीकार कर सकता था. वैज्ञानिक दर्शन पर आधारित परंपराएँ धीरे-धीरे अवैज्ञानिक हो गईं. और अवैज्ञानिक दर्शन तो प्रारंभ से ही गलत थे.
दर्शन के क्षेत्र में प्रमुख दार्शनिक प्रश्न क्या हैं?
दार्शनिक प्रश्न अकाट्य और अंतिम उत्तर देना कठिन होते हैं. जैसे-
इन प्रश्नों का सही उत्तर देना कठिन है, और दिया भी जाए तो उसमें संदेह बना रहता है.
सृष्टि के कर्ता की कल्पना क्यों मानव मस्तिष्क को आकर्षित करती है?
मनुष्य सहज बुद्धि से यह मानना कठिन पाता है कि इतना जटिल और व्यवस्थित संसार बिना किसी के बनाए बना हो. इसलिए बहुसंख्यक मानव समुदाय सहज ही सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास कर लेता है. लेकिन ईश्वर का स्वरूप, कार्य और नियंत्रण समझने के लिए लोग ज्ञानी उपदेशक की तलाश करते हैं. जो व्यक्ति अपनी कल्पना से जिज्ञासा शांत कर देता है, उसे लोग परमज्ञानी मान लेते हैं. त्याग और तपस्या का जीवन जीने वाले तपस्वियों पर सामान्य जनों की अत्यधिक आस्था होती है. उन्हें अतींद्रिय शक्तियों का स्वामी माना गया, और उनके उपदेश ब्रह्मवाक्य बन गए. इसके चलते धर्म समाज में जटिल और बढ़ता गया.
अज्ञान के कीचड़ में फंसी परंपराओं का कारण क्या है?
आज धर्म और दर्शन की प्रतिष्ठित परंपराएँ (वैज्ञानिक आधार वाली भी) अज्ञान के कीचड़ में उलझी हैं. कारण यह है कि उनका विज्ञान के विकास क्रम से संबंध टूट गया. प्राचीन काल में विज्ञान और दर्शन का क्षेत्र मुख्य रूप से भारत और यूनान था. भारत में वैज्ञानिक चिंतन गहन और व्यापक था. यूनान की परंपरा ईसा से पूर्व समाप्त हो गई, जबकि भारत में यह परंपरा एक हजार वर्षों तक विकसित होती रही. पिछले एक हजार साल से यूरोप नए वैज्ञानिक विकास का केंद्र बन गया. भारतीय दर्शन पुराने विज्ञान के अनुसार संशोधित नहीं हुआ, इसलिए कभी वैज्ञानिक था, वह अब अवैज्ञानिक हो गया. दर्शन के विकास रुक जाने के कारण धर्म रूढ़िग्रस्त हो गया.
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