श्रेणी : अन्य | लेखक : डॉ. राधेश्याम शुक्ल | दिनांक : 13 February 2026 17:28
भारतीय बौद्धिक परंपरा में ‘धर्म’ शब्द केवल पूजा-पद्धति या आस्था का पर्याय नहीं रहा है, बल्कि यह जीवन, समाज और व्यवस्था को संचालित करने वाला एक व्यापक सिद्धांत रहा है. समय के साथ, विशेषकर औपनिवेशिक प्रभाव के बाद, ‘धर्म’ का अनुवाद ‘रिलीजन’ के रूप में किया जाने लगा, जिससे दोनों शब्दों के अर्थ एक-दूसरे में मिश्रित होते चले गए. परिणामस्वरूप एक ऐसा वैचारिक भ्रम पैदा हुआ, जिसने मूल अवधारणाओं के अंतर को धुंधला कर दिया.
वास्तव में ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ दो भिन्न बौद्धिक परंपराओं की उपज हैं- एक सामाजिक-नैतिक व्यवस्था पर आधारित है, तो दूसरा मुख्यतः व्यक्तिगत विश्वास पर केंद्रित है. इन दोनों के अंतर को समझना केवल भाषाई अभ्यास नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और सामाजिक दृष्टिकोण को सही संदर्भ में समझने की आवश्यकता है. प्रस्तुत चर्चा इसी मूलभूत भेद को स्पष्ट करने का प्रयास है.
क्या ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ एक ही अर्थ रखते हैं?
अब तक के विवेचन से 'धर्म' की अवधारणा का स्वरूप काफी हद तक स्पष्ट हो चुका होगा. फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि 'धर्म' और ‘रिलीजन’ इन दोनों शब्दों की सदियों से चली आ रही विविध व्याख्याओं ने व्यापक भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी है. इस लघु प्रस्तुति का उद्देश्य उस समूचे भ्रम को समाप्त करना नहीं, बल्कि दोनों के बीच कुछ स्थूल और मूलभूत भेदो की ओर संकेत करना है.
भारत में आज 'धर्म' शब्द का प्रयोग प्रायः ‘रिलीजन’ के अर्थ में किया जाने लगा है, किंतु भारतीय चिंतन परंपरा में ‘धर्म’ की अवधारणा इससे कहीं अधिक व्यापक, बहुआयामी और जीवनव्यापी रही है. ‘धर्म’ केवल आस्था या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज, राष्ट्र और मानवता के सुव्यवस्थित संचालन का सिद्धांत है. इसके विपरीत ‘रिलीजन’ मूलतः विश्वास-आधारित प्रणाली है, जो किसी विशिष्ट मत, आचार्य या ग्रंथ पर केंद्रित होती है.
क्या ‘धर्म’ सभी के लिए अनिवार्य रूप से पालनीय है?
भारतीय संदर्भ में ‘धर्म’ का संबंध मुख्यतः राष्ट्र, समाज और मानवता से है. यह किसी एक गुरु, पैगंबर या ग्रंथ पर अंध-आस्था का विधान नहीं करता. यहाँ राष्ट्र-धर्म और समाज-धर्म की अवधारणा है, जो समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित हो सकती है. धर्म में आस्था का स्थान है, किंतु रूढ़िवाद का नहीं. यह किसी ईश्वरीय आदेश पर आधारित व्यवस्था नहीं, बल्कि लोकहित और मानवीय संतुलन पर आधारित सामाजिक व्यवस्था है. इसलिए एक देश या समाज में जो धर्म-नियम स्वीकृत होते हैं, वे वहाँ के सभी नागरिकों के लिए पालनीय होते हैं. यहाँ व्यक्तिगत चयन की स्वतंत्रता की अपेक्षा सामूहिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी जाती है. धर्म का अनुपालन इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह न्याय, सदाचार और सामाजिक संतुलन की रक्षा करता है.
क्या ‘रिलीजन’ में व्यक्ति को चयन की स्वतंत्रता होती है?
‘रिलीजन’ मूलतः विश्वास-आधारित व्यवस्था है. इसमें व्यक्ति को यह स्वतंत्रता होती है कि वह किसी भी मत, पंथ या संप्रदाय को स्वीकार करे या त्याग दे. यद्यपि व्यवहार में कुछ कट्टरपंथी समूह इस स्वतंत्रता को सीमित भी कर देते हैं, फिर भी सैद्धांतिक रूप से ‘रिलीजन’ व्यक्तिगत आस्था का विषय है. रिलीजन का संबंध किसी राष्ट्र या राष्ट्रीयता से नहीं होता. इसमें प्रायः एक आचार्य, गुरु, पैगंबर या एक ग्रंथ को सर्वोपरि माना जाता है. इसके सिद्धांतों को ईश्वरीय घोषित कर दिया जाता है, जिससे उनमें परिवर्तन की संभावना समाप्त हो जाती है. यहाँ तर्क या विवेक की अपेक्षा विश्वास को प्राथमिकता दी जाती है. यदि कोई व्यक्ति मूल सिद्धांतों को चुनौती देता है, तो उसे अक्सर उस रिलीजन का विरोधी या शत्रु घोषित कर दिया जाता है. इस प्रकार ‘रिलीजन’ में मूल सिद्धांतों के पुनर्मूल्यांकन की गुंजाइश बहुत सीमित होती है.
क्या ‘रिलीजन’ के विस्तार में लोभ और भय की भूमिका रही है?
चूँकि ‘रिलीजन’ व्यक्तिगत चयन पर आधारित है और उसका संबंध किसी विशेष राष्ट्र से नहीं होता, इसलिए उसके अनुयायियों की संख्या बढ़ाना उसके अस्तित्व और प्रभाव के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है. इतिहास साक्षी है कि अनेक रिलीजनों ने अपने विस्तार के लिए विभिन्न उपाय अपनाए. कभी स्वर्ग, बहिश्त या हेवेन के प्रलोभन दिए गए, तो कभी ईश्वरीय दंड का भय दिखाया गया. कहीं सामाजिक दबाव बनाया गया, तो कहीं प्रत्यक्ष हिंसा और युद्ध का सहारा लिया गया. विश्व इतिहास में अनेक ‘वार ऑफ रिलीजन’ हुए, जिनमें असंख्य लोगों ने प्राण गंवाए.
भारत में भी कई पंथ और संप्रदाय विकसित हुए, किंतु अधिकांश ने अपने सिद्धांत किसी पर थोपने का प्रयास नहीं किया. यहाँ खुली बहसों और वैचारिक विमर्श की परंपरा रही. व्यक्ति को यह स्वतंत्रता थी कि वह किसी मत को स्वीकार करे या त्याग दे. किंतु समाज-धर्म का पालन सभी के लिए आवश्यक था.
जब महापुरुष ‘धर्म स्थापना’ की बात करते हैं, तो उसका वास्तविक आशय क्या होता है?
भारतीय परंपरा में जब ‘धर्म स्थापना’ की बात कही जाती है, तो उसका आशय किसी विशेष पंथ या मत की स्थापना से नहीं, बल्कि न्याय, सदाचार और मानवता की रक्षा से होता है. गीता में श्रीकृष्ण का कथन “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे” समाज-धर्म और न्याय-व्यवस्था की पुनर्स्थापना की ओर संकेत करता है. यह किसी संप्रदाय-विशेष की रक्षा का उद्घोष नहीं है. इसी प्रकार रामचरितमानस में तुलसीदास जब धर्म की हानि की बात करते हैं, तो उसका आशय सामाजिक संतुलन, सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के दमन से है. महाभारत का युद्ध भी किसी विश्वास की स्थापना के लिए नहीं, बल्कि न्याय और अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था.
क्या भारतीय संदर्भ में धर्म की सर्वोपरिता का अर्थ न्याय की सर्वोपरिता है?
भारत में धर्म की सर्वोपरिता का अर्थ ईश्वरवाद या अनीश्वरवाद की सर्वोपरिता नहीं, बल्कि न्याय और सदाचार की सर्वोपरिता है. यहाँ विभिन्न मतों और विश्वासों को तब तक पूर्ण स्वतंत्रता है, जब तक वे न्याय और मानवता के विरुद्ध नहीं जाते. भारतीय परंपरा में असंख्य दार्शनिक मत और संप्रदाय पनपे, क्योंकि समाज ने उन्हें वैचारिक स्वतंत्रता प्रदान की. प्रतिबंध केवल इतना था कि वे व्यापक हित और न्याय के विरुद्ध न हों. इस दृष्टि से भारतीय धर्म का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, जबकि ‘रिलीजन’ का क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित है.
क्या हिंदू धर्म आधुनिक लोकतांत्रिक अवधारणाओं के अनुरूप है?
वर्तमान समय में हिंदू धर्म या हिंदुत्व को लेकर व्यापक चर्चा होती है. यदि उपर्युक्त विवेचन को समझा जाए, तो स्पष्ट होता है कि भारतीय धर्म- जिसे व्यापक अर्थ में हिंदू धर्म कहा जाता है- मत-स्वतंत्रता के स्तर पर अत्यंत उदार है. यह किसी विशेष मत को राज्य-सत्ता से जोड़ने की वकालत नहीं करता. यहाँ शासन न तो व्यक्तिगत मनमानी पर आधारित है और न ईश्वरीय आदेश पर. बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक की अवधारणा यहाँ गौण है; मूल तत्व न्याय और समानता है. किसी भी मत या विश्वास को तब तक पूर्ण स्वतंत्रता है, जब तक वह मानवाधिकारों और न्याय का उल्लंघन न करे.
‘धर्म की जय’ का वास्तविक अर्थ क्या है?
‘धर्म की जय’ का अर्थ किसी विशेष पंथ या विश्वास की विजय नहीं है. इसका वास्तविक अर्थ है- न्याय की विजय, मनुष्यता की विजय और मानवाधिकारों की विजय. इसी प्रकार ‘अधर्म का नाश’ का अर्थ है- जो कुछ अन्याय, अत्याचार और अमानवीयता के पक्ष में है, उसका अंत. ईश्वर, गॉड, खुदा या परमात्मा का विश्वास व्यक्तिगत आस्था का विषय है, किंतु यदि कोई मत न्याय और मानवता के विरुद्ध खड़ा होता है, तो वह धर्म नहीं हो सकता. यदि धर्म को इस व्यापक अर्थ में समझ लिया जाए, तो भारतीय संस्कृति और परंपरा का मूल स्वर सहज ही स्पष्ट हो जाता है.
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