शास्त्र और वचन हमेशा के लिए नहीं! वेद से लेकर धर्मशास्त्रों का क्या कहना?

शास्त्र और वचन हमेशा के लिए नहीं! वेद से लेकर धर्मशास्त्रों का क्या कहना?

श्रेणी : अन्य | लेखक : डॉ.राधेश्याम शुक्ल | दिनांक : 13 February 2026 17:59

मानव सभ्यता का विकास निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया के माध्यम से हुआ है. समय, समाज, ज्ञान और परिस्थितियों के साथ मनुष्य की सोच, आचार-विचार और व्यवस्थाएँ भी बदलती रही हैं. ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या प्राचीन शास्त्रों और धर्मग्रंथों के वचन सार्वकालिक और अपरिवर्तनीय माने जा सकते हैं? भारतीय परंपरा का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि यहाँ धर्म को जड़ और स्थिर नहीं, बल्कि जीवंत और गतिशील तत्व के रूप में देखा गया है. 

धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और वेदों की व्याख्याएँ भी समय-समय पर बदलती रही हैं. अनेक आचार्यों ने पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं में संशोधन करते हुए समाज को युगानुकूल दिशा देने का प्रयास किया. अतः शास्त्र-वचनों की चर्चा केवल श्रद्धा या आलोचना के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण से की जानी चाहिए. यही दृष्टि हमें भारतीय चिंतन की वास्तविक प्रकृति को समझने में सहायक बनाती है.

क्या धर्मशास्त्रों की आलोचना उचित है?

आज के समय में रोजाना यह देखा जाता है कि पुराने धर्मशास्त्रों और धर्माचार्यों की तीखी आलोचना की जाती है. उन पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने समाज में जड़ता, असमानता या अव्यावहारिक नियमों को जन्म दिया. किंतु यह प्रश्न गंभीरता से विचारणीय है कि क्या उन ग्रंथों ने स्वयं यह दावा किया था कि उनके द्वारा प्रतिपादित नियम सभी युगों और सभी समाजों पर अपरिवर्तनीय रूप से लागू रहेंगे?

वास्तव में प्राचीन धर्मशास्त्रों में कहीं भी यह आग्रह नहीं मिलता कि उनकी व्यवस्थाएँ शाश्वत और अकाट्य हैं. वे अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाई गई व्यवस्थाएँ थीं. आज की दृष्टि से उनमें से कई नियम अनुपयुक्त, अव्यावहारिक या अन्यायपूर्ण प्रतीत हो सकते हैं, किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वे अपने समय में निरर्थक थे.

यह भ्रम बाद के कुछ जड़ताग्रस्त तथाकथित धर्माचार्यों ने फैलाया कि वेदों, उपनिषदों और धर्मशास्त्रों के वचन अपरिवर्तनशील और सार्वकालिक हैं. यह प्रवृत्ति मूल भारतीय चिंतन की नहीं थी. भारतीय परंपरा में सतत परिवर्तन और युगानुकूलता को स्वीकार किया गया था. अतः दोष ग्रंथों या ऋषियों का नहीं, बल्कि उन लोगों का है जिन्होंने अपने स्वार्थ या जड़ता के कारण ग्रंथों को भी स्थिर और अचल घोषित कर दिया.

क्या मनुस्मृति की व्यवस्थाएँ युग-युग तक बाध्यकारी थीं?

समकालीन विमर्श में मनु और मनुस्मृति की व्यापक आलोचना होती है. यह कहा जाता है कि मनुस्मृति ने समाज में जाति-वर्ण, ऊँच-नीच और छुआछूत जैसी व्यवस्थाओं को संस्थागत रूप दिया. इन आलोचनाओं में आंशिक सत्य हो सकता है, किंतु यह देखना आवश्यक है कि क्या मनु ने स्वयं अपनी व्यवस्थाओं को ईश्वर-वचन या शाश्वत नियम घोषित किया था? मनु ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रत्येक युग का अपना धर्म होता है और युग परिवर्तन के साथ धर्म भी परिवर्तित होता है- 'अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरेऽपरे, अन्ये कलियुगे नृणां युग हासानुरूपतः.'

इस कथन का आशय यह है कि सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग जैसे विभाजन प्रतीकात्मक हैं; वास्तविक महत्व युगानुकूल परिवर्तनशीलता का है. एक युग का धर्म दूसरे युग में अपरिवर्तित रूप से लागू नहीं हो सकता. अतः मनुस्मृति की व्यवस्थाओं को ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए. उनके ग्रहणीय तत्वों पर विमर्श हो सकता है, किंतु उन्हें लेकर संपूर्ण परंपरा की निंदा करना उचित नहीं. हिंदू चिंतन की विशेषता किसी एक ग्रंथ में नहीं, बल्कि उसकी गतिशीलता और लोकहित-प्रधान दृष्टि में निहित है.

क्या वेद-वचन भी पूर्णतः अपरिवर्तनशील माने गए हैं?

यह मान लेना कि वेदों के प्रत्येक वचन को हर युग में अक्षरशः लागू माना गया, ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं है. स्वयं धर्मशास्त्रकारों ने कई वैदिक व्यवस्थाओं में संशोधन या निषेध किया. उन्होंने वेदों को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनमें अनेक शाश्वत मूल्य निहित हैं, किंतु समग्रता में उन्हें अपरिवर्तनीय भी नहीं माना. उदाहरणस्वरूप, वैदिक यज्ञों में पशुबलि का विधान था. गोमांस तक का उल्लेख मिलता है. श्राद्ध में मांस और मद्य के प्रयोग का वर्णन महाकाव्यों और सूत्रग्रंथों में मिलता है. किंतु परवर्ती धर्माचार्यों ने इन प्रथाओं को वर्जित कर दिया. नारदीय महापुराण में मधुपर्क में पशुहत्या, श्राद्ध में मांसदान, अश्वमेध, गोमेध, नरमेध आदि को निषिद्ध बताया गया.

वेदों में दीर्घकालिक यज्ञ-सत्रों का उल्लेख है, जो महीनों और वर्षों तक चलते थे. बाद के आचार्यों ने उन्हें समय और संसाधनों की दृष्टि से अव्यावहारिक मानकर त्याग दिया. सौत्रामणी यज्ञ में सुरापान का विधान था, जिसे आगे चलकर निषिद्ध कर दिया गया. इसी प्रकार आश्रम व्यवस्था में संन्यास और वानप्रस्थ की अत्यधिक महिमा गाई गई, किंतु व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण बाद में उन्हें सीमित या निषिद्ध किया गया. व्यास द्वारा कलियुग के एक चरण के बाद संन्यास को वर्जित ठहराया जाना इसी परिवर्तनशीलता का उदाहरण है. नियोग की प्रथा, आत्महत्या की सीमित स्वीकृति, श्राद्ध में मांस-प्रयोग, जल की पवित्रता के नियम. इन सभी में समय के साथ संशोधन हुए. इससे स्पष्ट है कि भारतीय परंपरा में शास्त्रों की व्याख्या स्थिर नहीं रही, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रही.

क्या हिंदू परंपरा में परिवर्तन की स्वीकृति उसकी सबसे बड़ी शक्ति है?

भारतीय धार्मिक-दार्शनिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह रहा कि परिवर्तन करने वाले आचार्यों ने पूर्ववर्ती ग्रंथों की निंदा किए बिना आवश्यक संशोधन किए. यह प्रक्रिया उसी प्रकार थी, जैसे आधुनिक संविधान में समय-समय पर संशोधन किए जाते हैं. संशोधन का अर्थ संविधान की अवमानना नहीं, बल्कि उसे युगानुकूल बनाना है. धर्मशास्त्रों और स्मृतियों के संदर्भ में भी यही दृष्टिकोण अपनाया गया. आधारभूत मूल्य-जैसे न्याय, लोकहित, संतुलन, सम्मान के योग्य रहे, किंतु व्यवहारिक नियमों में परिवर्तन किया जाता रहा.

जब हम कुछ दशकों में ही सामाजिक व्यवस्थाओं में व्यापक बदलाव की आवश्यकता अनुभव करते हैं, तो हजारों वर्ष पुराने नियमों को अक्षरशः लागू करना कैसे संभव हो सकता है? इसलिए हिंदू परंपरा की उपादेयता उसकी रूढ़िवादिता में नहीं, बल्कि उसकी मानववादी, विवेकाधारित और वैज्ञानिक प्रवृत्ति में है. यह परंपरा ईश्वर-वचन की आड़ लेकर जड़ता को नहीं थोपती, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन को स्वीकार करती है. विश्व के लिए हिंदू चिंतन का यही संदेश है. मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए नियमों में युगानुकूल संशोधन.